कहावतों में जाति विमर्श (Caste Discourse in Proverbs by Dr. Satya Priya Pandey) Part I



 डा. सत्य प्रिय पाण्डेय  
लोक साहित्य विमर्शकार 
असिस्टेंट प्रोफेसर, श्यामलाल कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय
   ईमेल -  pandeysatyapriya@gmail.com

ABSTRACT:
               Discriminations on the basis of caste, color and, race are common across the civilizations. These discriminations are reflected in various literary forms. In all the cases special features of that particular caste or race are interwoven in the writings. Proverbs and idioms are also used in daily life and literary work and present a complex social relationship and deep indicators of the mass psyche. In the European context, Jews, Polish, Italian, German and Spanish have some sort of proverbs about each other. Prof. S.P. Pandey of University of Delhi, India, in this scholarly article, has analyzed the racial discourses by citing some wonderful proverbs of India as well as rest of the world.-Editor/s

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संसार की शायद ही ऐसी कोई जाति रही हो जिस पर कहावतें बनीं हों | जहां जाति भेद नहीं रहा वहाँ नस्ल भेद रहा है, रंग भेद रहा है , भेद किसी किसी रूप में अवश्य रहा है | इसलिए भारत ही नहीं विश्व के अन्य देशों में भी जाति और नस्ल पर कहावतें मिलती हैं | यह इस बात का प्रमाण है कि हर जाति अथवा नस्ल की कोई कोई ऐसी विशिष्टता जरूर होती है जो उसे अन्य जाति से अलग एक विशिष्ट पहचान दिलाती है इसे कोई उसका दोष भले कहे किन्तु इनका बड़ा ही सूक्ष्म विश्लेषण कहावतों में प्राप्त होता है | एक फ्रांसीसी कहावत देखें जिसमें यहूदी , ग्रीक और अर्मेनियन के बारे में कहा गया है कियहूदी और साँप हों तो साँप पर विश्वास करो , यहूदी और ग्रीक में ग्रीक पर किन्तु अर्मेनियन पर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता | 1. यहूदियों के बारे में सभी देशों की कहावतों की राय लगभग एक ही तरह की है कि ये विश्वास के योग्य नहीं होते हैं | मसलन यहूदियों पर ही और कहावतें देखेंयहूदी ही यहूदी को धोखा दे सकता है 2.  व्यापार यहूदी को नष्ट कर देता है और यहूदी व्यापार को 3एक लिवोलियन कहावत देखें जिसमें यहूदी को सबसे ज्यादा ख़तरनाक बताया गया हैपोल जर्मन के द्वारा ठगा गया है , जर्मन इटैलियन के द्वारा , इटैलियन स्पैनियन के द्वारा , और स्पैनियन यहूदियों के द्वारा और यहूदी शैतान के द्वारा | 4.  संभव है कि यहूदियों ने अपनी कुटिलता से लोगों को ठगा हो और अपना विश्वास खोया हो | कहावतें यह बताती हैं कि यहूदी बहुत ही चलाक और कुटिल स्वभाव के होते हैं | कुछ अन्य देशों की कहावतें देखें मसलन स्लाविक के बारे में एक कहावत देखेंयदि आपने स्लाविक को घर में शरण दी तो वह आपको ही घर से ही बेघर कर देगा | 5 एक रूसी कहावत के अनुसारग्रीक्स साल में केवल एक बार ही सच बोलता है ( The Greeks only tell the truth once a year .) इस तरह से एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों के बारे में कैसी राय रखते हैं , यह कहावतों में देखा जा सकता है | और यह धारणा अकारण नहीं है बल्कि जिस देश ने दूसरे देश पर शासन किया तो उस साम्राज्यवादी देश के प्रति पराधीन देश के लोगों का भाव इन कहावतों में अभिव्यक्त हुआ है | उन्होंने बहुत नजदीक से देखा , परखा और तब जाकर यह बातें कहीं हैं , ये निष्कर्ष अनुभव प्रसूत हैं कि सुनी सुनाई बातों पर आधारित हैं  | वैसे तो सभी मनुष्य ही हैं किन्तु हर जाति का स्वभाव , उसकी आचरण पद्धति अलग अलग विशिष्टताओं से युक्त है, यह अपने आप में समाजशास्त्र और मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ विषय है | दरअसल यह जातिगत स्वभाव एक  दिन में नहीं बना होगा बल्कि यह एक लम्बी सामाजिक यात्रा की परिणति कहा जा सकता है | यहाँ हम भारत की कुछ प्रमुख जातियों से सम्बंधित कहावतों का विमर्श करेंगे | भारतीय समाज जाति प्रधान समाज रहा है | परस्पर जातियों में भेदभाव , उनमें खींच तान और वैमनष्य भारतीय समाज  की विशेषता रही है | इस वैमनष्य और विरोध के सामाजिक और आर्थिक कारण रहे हैं जिनसे इन जातियों का ऐसा स्वभाव बना | यों भी किसी जाति की स्वभाव निर्मिति में उसके व्यवसाय की प्रकृति और उसके प्रति समाज के दृष्टिकोण की भूमिका ही निर्णायक होती है मसलन कायस्थ जाति को ही देखें तो इन पर बहुत सी कहावतें बनी हैंभारतीय समाज में कायस्थ को बड़ा ही चालाक और कुटिल माना जाता है | ये प्रायः पटवारी का काम करते थे | फ़ारसी में दक्ष होते थे | अंग्रेजी राज में कायस्थ ही पटवारी का कार्य करते थेये हिसाब किताब में बड़े ही तेज होते थे और अपनी कलम का खाते थे | जमीन का रकबा घटाने बढ़ाने की कला में ये निपुण होते थे और इसी का फायदा उठाकर ये किसानों से रुपया पैसा भी वसूलते थे | इनके स्वभाव को उद्घाटित करती हुई यह कहावत देखें

जब एक कलम घसके , तब बावन गाँव खसके || और भी देखें
आमा नीबू बानिया चांपे ते रस देयं , कायथ कौआ करहटा मुर्दा हूँ से लेयं || 
आम , नीबू और बनिया को दबाना पड़ता है यानी ये सरलता से वश में नहीं आते उसी तरह से कायथ , कौआ और महापात्र ये मुर्दे को भी नहीं छोड़ते , जिन्दा की तो बात ही अलग है | कायस्थ पैसा लिए बिना कोई काम नहीं करता था , कहावत बनी – 
 कायथ किछु लेले देलें , बरहमन खियौलें ,
धान पान पनियौलें , राड़ जाति लतियौलें || 6 
ये कहावतें तुलनात्मक विमर्श भी प्रस्तुत करती हैं मसलन एक ही कहावत में दोदो , तीनतीन जातियों का स्वभाव वर्णित हुआ है | कहीं कहीं तो इनके स्वभाव का तुलनात्मक विमर्श कुछ इस रूप में हुआ है कि – 
       कायथ से धोबी भला , ठग से भला सोनार ,
       देवता से कुत्ता भला , पंडित से भला सियार || 7  
कायस्थ के बारे में क्षेमेन्द्र अपनी पुस्तक लोकप्रकाश में लिखते हैं-
                कयास्थोनोदरस्थेन मातुरामिषशंकया |
           अन्त्राणि किं जग्धानि , तत्र हेतुरदंतता || 8  
अर्थात मां के उदर में कायस्थ ने अपनी मां का मास नहीं खाया इसका कारण यह नहीं था कि उसे अपनी मां से स्नेह था कारण यह था कि उस समय उसके दांत नहीं थे | क्षेमेन्द्र और भी लिखते हैं कि 
             कल्माग्रनिर्गतमषी बिन्दुव्याजेन सज्जनाश्रुकणैः |
              कायस्थ लुन्ठ्यमाना रोदिति खिन्नेव राज्यश्री || 9  
कायस्थ की कलम की नोंक से जो स्याही निकलती है मानो वह स्याही नहीं बल्कि ब्याज के रूप में लोंगों का अश्रुकण है | कायस्थ से लूटा गया व्यक्ति ऐसे रोता है जैसे राज्य विनष्ट होने पर राजा रोता हैक्षेमेन्द्र लिखते हैं कि कायस्थ की बात और और उसकी लेखनी दोनों में गूढ़ता रहती है , कोई उसे समझ नहीं सकता हैगूढ़तरः निवसति कायस्थानां मुखे लेखे || कायस्थ के विषय में आचार्य क्षेमेन्द्र ने बड़ा ही यथार्थपूर्ण वर्णन किया है वे लिखते हैं कि ये (कायस्थ) निरंतर माया , प्रपंच और संचय में संलग्न रहते हैं किन्तु संचय से वंचित भी रहते हैं | ये निरंतर संसार का विनाश करते रहते हैं और विशेष रूप से गाँवों को अपना विषय रुपी ग्रास समझकर उसका विनाश करते हैं | कायस्थ की तुलना खटमल से की गई है | जैसे खटमल खून चूसता है वैसे ही कायस्थ भी लोगों का खून चूसता है , काहावात देखें – 
                      छूते मरें , दौड़ के काटें , इन पीड़ा की पीड़ा |
पीड़ा देय दो बने हैं , कायथ और खटकीरा || 10 
यहाँ पीड़ा का का दो अर्थ है , एक है तकलीफ देना दूसरा है पीढ़ा | पीढ़े में खटमल रहते हैं और बैठते ही काटते हैं , कायस्थ का भी यही स्वभाव होता है | इन दोनों का जन्म मानों मनुष्यों को पीड़ा देने के लिए ही हुआ है
ब्राह्मण : सभी जातियों में ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ जाति मानी जाती थी , और वह समूची  समाज व्यवस्था में सर्वोच्च पायदान पर विराजमान था यद्यपि ऐसा कहा जाता है कि यह सब कुछ ब्राह्मणों ने अपने फायदे के लिए गढ़ा था | इस लिहाज से ब्राह्मण सबसे चालाक और धूर्त भी माने जाते रहे हैं | यही कारण है कि ब्राह्मणों पर कहावतें भी कईकई बनाई गई हैं | ब्राह्मण का व्यवसाय था पांडित्य कर्म | और पांडित्य कर्म में वह पूजा पाठ कराता था , दान लेता था और भोजन करता था | ब्राह्मण को लोभी भी कहा गया है और इसलिए एक कहावत यह बनी किबामन हाथी चढ़ा भी माँगे | ब्राह्मणों  में परस्पर विद्वेष होता है , वे आपस में एक दूसरे की तरक्की नहीं देख सकते इसलिए उनमें परस्पर फूट होती है और वे अलगअलग रहते हैंकहावत देखेंतीन कनौजिया तेरह चूल्हा | और भीबाभन कुत्ता हाथी , तीनों जाति के घाती || ये स्वजाति भक्षक कहे गए हैं | दरअसल  हमें यह देखना होगा कि ब्राह्मण का यह स्वभाव कैसे बना , उसके पीछे कौन सी सामाजिक , और आर्थिक  स्थितियाँ जिम्मेदार रही हैं | मसलन पुरोहिती ब्राह्मणों का मुख्य व्यवसाय थी , वे पूरी तरह से यजमान पर निर्भर रहता था , पंडिताई को लेकर गला काट प्रतियोगिता भी , पंडितों में बढ़ाचढ़ी होती थी ,अपने अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रश्न था , यह कठिन था इसलिए भी उनमें परस्पर विद्वेष होता था | यजमान की स्थिति यह थी को जो कुछ भी सड़ागला है , उसे पंडित के गले लगा दो इसलिए यह कहावत बनी किमरी बछिया बभने के नाँव | यही कहावत मगही में इस रूप में है किसरल गाय ब्राह्मण दान | इस लाचारी को दरकिनार करके ब्राह्मण का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता | ये कहावतें अपने भीतर अपने समय की सामाजिक आर्थिक सन्दर्भों को समेटे हुए हैं | जिस ब्राह्मण को अन्न का लाला रहा हो ,( कोइरी काम के , बाभन अन्न केदूसरे के दान पर निर्भर रहना पड़ता हो , उसको दान में निकृष्ट अन्न और वस्त्र दिया जाना अपने आप में यह दर्शाता है कि लोग उसके प्रति कैसा भाव रखते थे | यहाँ एक प्रश्न और भी है कि इस उपेक्षा के सामाजिक , सांस्कृतिक कारण क्या थे ? पुरोहिती क्यों ख़राब मानी जाती  थीरामचरितमानस में सन्दर्भ आया है कि वशिष्ठ राम से कहते हैंउपरोहित्य कर्म अति मंदा , वेद पुरान स्मृति कर निंदा || ( उत्तरकाण्ड ) हे राम उपरोहिती बहुत ही निकृष्ट कर्म माना गया है किन्तु आपकी सेवा के लिए मैंने ऐसा निकृष्ट कर्म भी स्वीकार किया | यह तुलसी के समय का भी सच है क्योंकि तुलसी भी ब्राह्मण होने के अभिशाप से बंधे हुए थे और इसलिए भी उनकी दरिद्रता लोगों को द्रवित नहीं कर पाती थी क्योंकि यह एक आम राय बनी हुई है कि ब्राह्मण तो जन्मजात मंगता होता है , दरअसल उसका अपरिग्रही स्वभाव ही उसके लिए अभिशाप बन गया , वह भी अगर दूसरे का गला काटता और संग्रह करता तो शायद उसे अपमानित होना पड़ता | उपरोहिती निंदनीय कर्म संभवतः इसलिए भी माना जाता रहा हो कि इसमें अनापसनाप तरीके से कमाए गए धन का दान भी स्वीकार करना पड़ता है , और दान लेने से कठिन है उसे पचा पाना | इसके लिए तप करना पड़ता था , गायत्री मन्त्र का जाप करना पड़ता था , त्रिकाल संध्या भी करनी पड़ती थी | तप में बहुत बल होता है मानस में आया हैतपबल करइं संभु संहारा || 11    कालांतर में ब्राह्मणों ने ये संस्कार छोड़ दिए और केवल दान लेने में अपने कर्तव्य की इति श्री समझ ली , इसलिए भी उनमें गिरावट आईयों सभी ब्राह्मण उपरोहित्य कर्म में शामिल नहीं थे , बहुत से ब्राह्मण खेतीबाड़ी करके अपनी आजीविका चलाते थे | जो कर्मकांड जानते थे , अथवा जिनकी पीढ़ी में कर्मकांड की परंपरा रही हो ,वही इस व्यवसाय में जाते थे | बाद में चलकर उपरोहित्य कर्म में में भी ऐसे ब्राह्मण आने लगे थे जिन्हें कर्म काण्ड की जानकारी नहीं होती थी , पूजा पाठ विधि विधान से कराना नहीं जानते थे किन्तु आजीविका के लिए पंडिताई शुरु कर देते थे , कहावत देखें -  
          बड़ा धोता बड़ा पोथा , पंडिता पगड़ा बड़ा | अक्षरं नैव जानामि , हाँजी हाँजी करोम्यहम || 12 
ब्राह्मण भोजन के प्रेमी होते थे , उन्हें मिष्ठान्न अत्यधिक प्रिय था | वे श्राद्ध वगैरह में भी भोजन करते थे और कहावत में आया है कि वे श्राद्ध आने पर बड़े प्रसन्न होते थे , कहावत देखेंआये कनागत फूले कांस , बामन उछले नौ नौ बाँस | गए कनागत टूटे आस , बामन रोवै चूल्हे पास || भोजन के बाद वे यजमान से दक्षिणा की अपेक्षा रखते थे और दक्षिणा में मानों उनका प्राण बसता होइस पर कांगड़ा की एक कहावत देखें – 
      अकर कर मकर कर , खीरी पर शकर रख
     जितने करूला करी बैहंगा , दछणा दा फिकर कर || 13 
अकर कर मकर कर खीर पर शक्कर रख | जितने में कुल्ला कर बैठूँ , दक्षिणा का फिकर कर
    ब्राह्मण खाते बहुत हैं इस पर एक कहावत देखेंअहिर पेट गहिर , बभने पेट मड़ारब्राह्मण से अपेक्षा की जाती  थी कि वह नियम धर्म से रहे , चोरी , जुआ , शराब , परस्त्री आदि से दूर रहे , ब्राह्मण होकर चोरी करना अत्यंत गर्हित कार्य माना जाता था , कहावत देखें – 
    बामन हो चोरी करे , विधवा पान चबाय | क्षत्री हो रण से भगे , जन्म अकारथ जाय || 14 
 कांगड़ा की एक कहावत में भी इसी तरह की बात कही गई हैएह पाणे बल्दे चूल्हेब्राह्मण होई अणनहोतिया खाए , रजपुते दा पुत रण से हटी जाए , जौहरी पुत्र लेखे भुल्ले | अर्थात ब्राह्मण होकर बिना नहाए खाए , राजपूत का पुत्र युद्ध से भाग जाए , जौहरी का पुत्र लेखाजोखा भूल जाए तो इन तीनों को जलती आग में डाल देना चाहिए  
राजस्थान की एक कहावत में भी कुछ इसी तरह की बात कही गई है – 
                     गो खेदै मदरा पिवै , बेस्या वाड़ै जाय |
बिन न्हाये भोजन करै , सो बामण मर जाय || 15 
राजस्थान की ही एक अन्य कहावत है जिसमें प्रसंग आया है कि जब दो ब्राह्मण आपस में मिले तो वे एक दूसरे को नमस्कार करके चलते बने , क्योंकि उन्हें एक दूसरे को देना लेना तो कुछ है नहीं , केवल नमस्कार ही करना है – 
        बामण से बामण मिल्यो , पूरबलै जलम का संसकार |
लेण देण नैं कुछ नहीं , नमसकार ही नमसकार || 16 
कर्मकांड से जुड़े होने के कारण ब्राह्मणों पर यह आरोप भी लगा कि वे जीते जी लोगों का खून चूसते हैं 
और मरने पर भी वे पीछा नहीं छोड़ते | ये जीते जी भी खाते हैं मरे पर भी खाते हैं , एक कन्नौजी कहावत देखें – 
जियतउ पुजवइहैं अउ मरतउ  पुजवइहैं |
  जियतउ खाइँ अउ मरेउ पइ खाइँ | 17  
ब्राह्मण को मूर्ख भी माना जाता रहा है , यद्यपि यह भी कहा जाता था कि वे समाज को मूर्ख बनाए हुए थे | अब सवाल यह भी है कि एक मूर्ख कैसे पूरे समाज को मूर्ख बना सकता हैब्राह्मण साठ साल तक पोंगा रहते हैं , कहावत देखेंबाम्हन साठ साल में पोंगा फिर सठियाइ जाति हैं ||
यानी साठ साल तक तो वैसे ही बुद्धि नहीं रहती , उसके बाद सठिया जाते हैं | बहरहाल यह जरूर है कि ब्राह्मण दूसरे को उपदेश देने में माहिर रहे हैं और लोकपरलोक का डर दिखाकर वे अपना उल्लू सीधा करते थे | एक कहावत देखें जो यह उद्घाटित करती है कि पंडित का लड़का कभी मूल में हुआ ही नहीं जबकि दुनिया जहान की वे मूल शांति कराते रहते हैं , उनका लड़का भी तो मूल में पैदा हो सकता है ? यानी कि यह भय दूसरों को दिखाकर उनसे धन ऐठने के काम करते थे पुरोहित , कहावत बनीबाम्हन को लरिका मूलन मा नाइँ होति || 18  बहुत सी कहावतों के पीछे कोई कोई घटना अथवा जुड़ी हुई है , और उसका सार उन कहावतों में अभिव्यक्त हुआ है मसलन एक कहावत हैसात पाँच लरिका एक संतोख , गदहा मारे नाइ दोख || इसका अवधी पाठ इस प्रकार हैजौ येहमें शामिल संतोषा , गदहा मारे कछू दोषा ||  इस काहावत के बनने के पीछे की कहानी यह है कि एक बार पाँच सात लड़कों ने मिलकर एक गधे को मार दिया | उसमें पंडित का लड़का भी था | उन लड़कों के घरवाले पंडित जी के पास गए और बोले महराज हमारे बच्चों ने एक गधे को मार दिया है , इसका प्रायश्चित कैसे होगा ? पंडित ने सोचा कि  इनको अच्छा ख़ासा खर्च बताया जाय जिससे कुछ ठीक ठाक लाभ हो जाए ( क्योंकि वैसे भी आदमी संकट पड़ने पर ही पंडित को खोजता था , वैसे कौन इन्हें पूँछता ) उन्होंने कहा कि पत्रा देखकर बताता हूँ कि इसका प्रायश्चित क्या है ? थोड़ी देर साँस खींचने के बाद पंडित जी ने कहा भाई यह अपराध तो बहुत बड़ा है , इसमें आप लोगों को आधा किलो के वजन का सोने का गधा पंडित को दान देना होगा तब जाकर यह अपराध दूर होगा | वे लोग समझ गए कि पंडित जी काट रहे हैं , बोले कि  महाराज उसमें आपका लड़का संतोष भी था | बस पंडित जी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं , बोले अच्छा तब मैं फिर पत्रा देखकर बताता हूँ कि क्या करना होगा ? पंडित जी ने अपने मन में सोचा कि इसमें तो बड़ा खर्च हो जाएगा | आधा किलो सोने में अगर तीसरा हिस्सा भी मुझे देना होगा तो मेरे लिए बड़ी भारी मुसीबत है | थोड़ी देर बाद पंडित जी ने कहा कि आप लोगों को कुछ नहीं करना है , जब उसमें संतोष शामिल है तो आप लोगों को कोई पाप नहीं लगेगा | ब्राह्मणों के बारे में यह भी  कहा जाता था कि ये समाज के सबसे बड़े शोषक हैं , ये लोगों का खून उसी तरह चूस लेते हैं जैसे पिस्सू और खटमल | जरा कहावत की धार देखेंइस दुनिया के तीन कसाई , पिस्सू , खटमल बाभन भाई || कई कहावतों में यह भी कहा गया है कि ब्राह्मण विश्वास के योग्य नहीं होते ये जनेऊ पहनकर , गंगा में खड़े होकर भी यदि कोई बात कहें तो भी उस पर विश्वास नहीं करना चाहिएब्राह्मणों में भी जो अलग अलग श्रेणियां हैं उनके स्वभाव पर भी कहावतें बनी हैं और इससे यह प्रमाणित होता है कि उनमें परस्पर उपहास और हास्य विनोद हुआ करता था | मसलन तिवारी पर बनी यह कहावत देखेंतेवारी मेवारी बन कै बिलारी , जहाँ देखैं सोहारी , उहाँ कूदि परैं डंड़वारी || इसमें तिवारियों की पूड़ी प्रेम तो है ही साथ ही इनका लोभ और लालच  भी अन्तर्ध्वनित है | पाण्डेय लोगों पर भी इसी तरह की कहावतें बनीं हैं जिसमें कहा गया कि
                       पांड़े पड़ाइन नेवता बा , सरी सरी आलू भरता बा || 
ब्राह्मणों की अन्य श्रेणियों पर भी कहावतें बनायी गईं मसलन मिश्र पर बनी यह कहावत देखें कि – 
                        मिसिर करयं घिसिर घिसिर , पौआ नून चबायं ,
                   आधी राति कि कोल्ला लागय , मेहरी से गोर्रायं || 
संभव है मिश्र लोग ज्यादा नमक खाते रहे हों तो उपहास के लिए यह कहावत बनी हो | और भी देखें जिसमें ब्राह्मणों की कई श्रेणियों को एक साथ निशाना बनाया गया है – 
                   चउबे  चापट दुबे चमार , तिवारी हर जोतना शुकुल चमार |
उठा तिवारी ब्वारा ड्वाबा , चार लात चउबे का मारा || 19 
ब्राह्मण पूड़ी खाने के लिए बहुत दूरदूर तक जाते थे | उनका पूड़ी प्रेम अत्यंत प्रसिद्ध था | उनके साथ लोग हास परिहास भी करते थे मसलन  अवधी में एक कहावत यह बनी किपंडित आपण लोटा पायेंन , यहिं पूड़ी बाजु आयेंन || इस कहावत की निर्मिति यों हुई कि पंडित कहीं पूड़ी खाने गए थे , पंडित जी से हासपरिहास करने के लिए लोगों ने उनका लोटा कहीं छिपाकर रख दिया ( पहले लोग अपना लोटा लेकर पूड़ी खाने जाते थे ) पंडित परेशान हो गएलोटा पहले स्टील का नहीं चलता था बल्कि काँसे का अथवा फूल का या पीतल का होता था और कीमती होता था , अगर लोटा एक बार खो जाय तो पुनः खरीदने की स्थिति नहीं होती थी | और भी होती भी हो तो क्या केवल लोटा ही खरीदते रहेंगे ? ) इस लिए पंडित परेशान हो गए थे और बाद में लाकर उन्हें लोटा दिया गया तो वे पूड़ी का त्याग कर चलने लगे | लोगों ने आग्रह किया कि पूड़ी खाकर जाइए तो उन्होंने कहा कि मुझे अपना अपना लोटा मिल गया , हमें आपकी पूड़ी नहीं चाहिए | प्रकारांतर से वे यही कह रहे थे कि अगर लोटा खो जाता तो यह पूड़ी बड़ी मँहगी पड़ जाती |  
ब्राह्मण से सेवा लेना सर्वथा वर्जित था , जो ब्राह्मण से टहल कराता है, उसे नौकर रखता है उसके धन की हानि होती है , ऐसा भी कहावतों में मिलता है , कहावत देखें – 
                          विप्र टहलुआ चीक धन , बेटी कौ बाढ़ |
येते पै धन ना घटै , करौ बड़े से रार || 20 
ब्राह्मण और गाय अवध्य कहे गए हैं | ईश्वर के अवतार लेने के निहितार्थ में गाय और ब्राह्मण की रक्षा भी सन्निहित है , मसलन मानस की पंक्ति देखें – 
                          विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार |
निज इच्छा निर्मित तनु , माया गुण गो पार || 21 
कहावतों में भी यही बात प्रकारांतर से कही गई है , मसलन अवधी की एक कहावत देखेंइसमें कहावत से ज्यादा हिदायत है
  कहेन बाभन बछिया बचाया , जब बड़ेरी चढ़ै तबकहेन तबै बचावै बा ||
यानी ब्राह्मण और गाय अवध्य हैं , इन्हें मारना नहीं है चाहे ये कितना भी परेशान करें , नाक के ऊपर हो जाय तब भी इन्हें मारना नहीं है | दरअसल जातीय सोपान में ब्राह्मण सबसे ऊपर रहे हैं और यह भी कहा जाता है कि ब्राह्मणों ने ही यह सोपान निर्मित भी किया था | जाहिर है उन्होंने अपने लिए कुछ विशेषाधिकार जरूर बनाए | यों पहले वर्ण बना बाद को जाति बनी | वर्ण ही जाति के रूप में निर्धारित हो गया | ब्राह्मणों ने अपनी जाति की श्रेष्ठता का लाभ लिया हो , इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता | लेकिन इतना तो जरूर है कि अपने कर्म द्वारा समाज को एक आदर्श प्रस्तुत करना इनका प्रमुख धर्म था , अपरिग्रही रहकर स्वाभिमान पूर्ण जीवन यापन कर विद्या का दान देना इनका कर्म था किन्तु देश काल की कठोर परिस्थितियों के थपेड़ों ने इसमें समयसमय पर बाधाएं भीं उपस्थित कीं अन्यथा द्रोणाचार्य जैसा व्यक्ति पथच्युत होता | दरिद्रता ने ब्राह्मणों को पथभ्रष्ट किया और वे कालांतर में लोभी और लालची होते चले गए जबकि संस्कृत में एक सूक्ति आयी है जिसके अनुसार – 
                असंतुष्टा द्विजा नष्टा , संतुष्टा महीभुजः
                सलज्जा गणिका नष्टा , निर्लज्जा कुलांगना || 22  
अर्थात असंतुष्ट ब्राह्मण नष्ट हो जाता है , संतुष्टि राजा को नष्ट कर देती है , लज्जाशील वेश्या नष्ट हो जाती है और निर्लज्ज कुलवधू नष्ट हो जाती  है  |  
 प्रतिकूल परिस्थितियों में और आर्थिक दबाव के वशीभूत हो ब्राह्मणों ने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अपने स्वाभिमान से समझौता भी किया किन्तु ऐसा लगता है कि जो महत्तर कार्य उनके द्वारा संपादित होना चाहिए था , वह हो सका | लेकिन कहावतों से यह तो स्पष्ट ही है कि सामाजिक आर्थिक पक्ष को दरकिनार कर किसी भी जाति का मूल्यांकन संभव और संगत नहीं है , ब्राह्मण जाति भी इसका अपवाद नहीं |  
बनिया : बनिया  भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण जाति रही है | यह व्यापार और वाणिज्य से जुड़ी रही है | व्यापार में हेर फेर करने में ये खासे निपुण होते थे | किसी को ठग लेना , सामान का वजन कम तौलना , मुनाफ़ा कमाना इनकी प्रवृति रही है | एकएक पैसा इनके प्राण के पीछे होता है | इनके इसी स्वाभाव को बताते हुए कबीर ने लिखा था – 
           मन बनिया बनिज छाँड़े , जनम जनम का मारा बनिया अजहूँ पूर तौले || 
क्षेमेन्द्र ने अपनी पुस्तक कलाविलास में बनियों के स्वभाव और उनकी कुटिलता का बड़ा ही सटीक वर्णन किया है मसलन वे लिखते हैंखरीद , बेच झूठी तराजू पर कम तौल , रेहन बट्टे का काम और ब्याज , इन सब से दिन के चोर बनिये ख़ुशी से लोगों को लूटते हैं | क्षेमेन्द्र और भी लिखते हैं कि वह दान , पुन्य बोल्कुल नहीं करता , द्वादशी , पिता के श्राद्ध के दिन , संक्रांति तथा सूर्य और चंद्रग्रहण के दिन वह डटकर नहाता है पर देता एक कौड़ी भी नहीं है | क्षेमेन्द्र के काल में निःसंदेह बनियों का व्यवहार अत्यंत कुटिल रहा होगा इसीलिए वे इनके बारे में इतनी कठोर बातें कहते हैं | वे लिखते बनिए की कंजूसी पर प्रहार करते हुए लिखते हैं किकंजूस बनियों के लबालब भरे , पर भोगे जाने वाले धन के घड़े बाल विधवाओं के भरे हुए , पर असम्भोनीय स्तनों की तरह यों ही नष्ट हो जाते हैं | उन्होंने इनकी उपमा चूहों से देते हुए लिखा किबिना दान और भोग के हमेशा सोने की रक्षा में तत्पर बनिए संसार रुपी टूटे - फूटे घर के मोटेताजे चूहों की तरह हैं | उन चूहों के उपभोग में बाधक , कुटिल , कांटेदार , अपना बिकराल फन फैलाए राजा नाम का खजाने का साँप है | 23 
बनिए की कंजूसी और लोभ पर बहुत सी कहावतें मिलतीं हैं | सभी कहावतों में एक स्वर से यही बात कही गई है कि बनिया धन का लोभी होता है | उससे धन निकालना अत्यंत दुष्कर है | वह सरलता से अपने टेंट से पैसा नहीं निकालता | कहावत देखेंआमाँ नीबू बानिया , चांपे ते रस देयं || ये स्वभावतः कंजूस होते हैं , यह इनका गुण भी है और दोष भी | यदि ये उदार हुए तो धन का संग्रह नहीं कर पायेंगे मसलन घाघ की एक कहावत देखें जिसके अनुसार बनिए को मितव्ययी होना ही चाहिए – 
             बनिया सखरच  ठकुर हीन , बैद पूत व्याधि नहिं चीन्ह |
पंडित चुपचुप बेसवा मइल , घाघ कहैं पाँचों घर गइल || 24 
ये किसी संकट में पड़ने पर ही धन निकालते है , इस पर राजस्थान की एक कहावत देखेंबाणियों के तो आंट में दे के खाट में दे | और इसके साथ ही एक कहावत यह भी जुड़ी हुई है कि – 
                  बाणियो खाट में तो बामण ठाट में , बाणियो ठाट में तो बामण खाट में || 25 
यानी बनिया जब बीमार पड़ता है तो ब्राह्मणों की मौज रहती है क्योंकि उन्हें वह पूजा पाठ के लिए आमंत्रित करता है और इसी बहाने उन्हें अर्थ की प्राप्ति होती है लेकिन जब बनिया ठाट में रहता है तो ब्राह्मण बेचारा दुखी रहता है , अभावग्रस्त रहता है | इस काहावत से यह भी स्पष्ट है सामाज में कैसे एक जाति दूसरे पर आश्रित रहती थी , परस्पर अवलंबित रहती थी | एक का दुखी होना दूसरे के सुखी होने का कारण बनता था | राजस्थान में बनिए पर बहुत सी कहावतें मिलती हैं मसलन एक कहावत देखेंबड़ो पकोड़ो बाणियो तातो लीजै तोड़ || यानी बनिया , पकोड़ा और बड़े को ताजा ही ले लेना चाहिए , इन्हें प्राप्त करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए | मसलन बनिया से तत्काल अपना पैसा ले लेना चाहिए क्योंकि बाद में वह देगा , यह कहना मुश्किल है | और भी कहावतें देखेंविणज करैला बाणियां और करैला रीस | व्यापार तो बनिया ही कर सकता है और लोग करेंगे तो झगड़ा कर लेंगे | इसका निहितार्थ यह है कि व्यापार में जिस धैर्य और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, वह केवल बनिए में ही होती है | वह दो चार गाली सुनकर भी बर्दाश्त कर लेता है , उसे क्रोध नहीं आता है | क्रोध से व्यापार नष्ट हो जाता है | व्यापार उसके खून में बसा होता है और उसे अत्यंत प्रिय होता है इसलिए वह मरने के बाद स्वर्ग में भी अपनी इस आदत को नहीं छोड़ता है , वहाँ वह यमराज से ही सौदा कर लेगा और बीच में बिचौलिया बनकर पैसे खा जाएगा , कहावत देखें – 
                              बाण्यो बाण छोड़सी , जे सुरगापुर जाय |
                               साहब सो सौदा करे , कोई टक्को पीसो खाय || 26 
बनिए की मित्रता स्थाई नहीं होती , वह क्षणिक होती है | वह मित्रता भी लाभ देखकर करता है, कहावत बनी कि - बणिक पुत्रं कभी मित्रं , जब मित्रं तब दगी दगा || और भी देखें
                        बाण्यो मीत वेश्या सती , कागा हंस गधा जती ||
ऐसा भी कहा गया है कि परिचित बनिया और ज्यादा ठगता हैजाण मारै बाणियां , पहचान मारै चोर ||  जिस बनिए का नाम हो जाता है उसके पास  ज्यादा लोग जाते हैं- नामी बनिया सन्नामी चोर | यानी प्रसिद्ध होने पर बनिया अत्यधिक कमाता है | बनिए से भगवान भी पार नहीं पा सकते , वह उन्हें भी ठग लेता है, चकमा दे देता हैइस पर आधारित राजस्थान की एक  छोटी सी लोककथा देखेंएक बनिए के बेटा नहीं था | लोगों ने कहासेठ जी आप भैरो जी की पूजा करो , तुम्हारे बेटा हो जाएगा | बनिया भैरो जी के मंदिर में गया और हाथ जोड़कर बोलाभैरो बाबा , यदि आप मुझे बेटा दे दें तो मैं आपको एक भैंसा चढ़ाऊंगा | कुछ दिन बीता , बनिए के बेटा हुआ | बनिया भैंसा लेकर भैरो  के मंदिर गया | लेकिन मंदिर में कोई था नहींभैंसा  किसे दे ? उसने भैंसे को भैरो जी की मूर्ति में ही बाँध दिया | थोड़ी देर तो भैंसा खड़ा रहा बाद में उसने रस्सी खींच कर भैरो की मूर्ति उखाड़ दी और मंदिर से चल पड़ा | थोड़ी ही दूर पर देवी का मंदिर था | देवी ने भैरो का यह हाल देखकर कहाभैरो भाई , आज तुम्हारा यह कैसा हाल है ? भैंसा कैसे तुम्हें उखाड़ लाया ? भैरो ने कहाठीक है देवी , तुम तो मंदिर में ही बैठी ताकती रहती हो , कभी बनिए को बेटा देकर देखो तो पता चले | 27 
                           इन कहावतों से स्पष्ट है कि बनिया बड़ी ही चालाक और कुटिल जाति रही है | सेठ , साहूकार , महाजन सब इन्हीं के रूप रहे हैं जिन्होंने आम जनता को , गरीबों को , मजदूरों को लूटनेखसोटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी | ये किसानो से बड़े ही औनेपौने दामों में फसल खरीदकर कई गुना मँहगे दामों में बेचते हैं | कृषक बेचारे मरमर कर अनाज उपजाते हैं किन्तु  वे खराब अनाज खाने को विवश होते हैं और महाजन गेहूं खाकर मौज करते हैं - इसी पर आधारित एक बड़ी ही महत्वपूर्ण  कहावत देखें – 
                                      कूर कुरसा खाय , गेहूँ जीमै बानियां || 28 
महाजन के इसी शोषण पर अज्ञेय ने बड़ी ही मार्मिक कविता लिखी थी – 
      ...................................... कट गई फसलें हमारे खेत की  , 
     झोपड़ी में लौ बढ़ाकर जोत की , गिन रहा होगा महाजन सेंत की || 29    
 नागार्जुन ने भी अपनी एक कविता में कहा है – 
                    आज की शाम वे बाज़ार जा रहे हैं
                    उनसे मेरा अनुरोध है कि बाजार के बिचौलिए के पास जाकर
सीधे उस खेत में जाएँ जहां धान पकने की खुशबू से सराबोर है |  
आज यह बनिया और महाजन बड़ेबड़े पूंजीपतियों और उद्योगपतियों में तब्दील हो गया और उसने समूचे समाज को अपने चंगुल में ऐसा जकड़ लिया है कि इनके चंगुल से निकल पाना अत्यंत दुष्कर है | इस बनिए ने छोटे मोटे कारोबारियों , रेहड़ी पटरी लगाने वालों की दुकाने बंद कर दीं और बड़ेबड़े विशाल दैत्याकार मॉल खोलकर पानी तक बेचने लगा | यहाँ तक कि यह सरकारों को संचालित कर रहा है | आज यह बनिया और भी बिकराल हो गया है | इसे शासन और सत्ता का बल प्राप्त है |  
   राजपूत राजपूत क्षत्रियों की उपजाति है | क्षत्रियों को ठाकुर भी कहा जाता रहा है | प्रारम्भ से ही यह लड़ने भिड़ने वाली जाति रही है | लोगों की रक्षा करना , मदद करना , अन्याय और अत्याचार का प्रतिकार करना इनका धर्म और कर्म रहा है | युद्ध प्रियता क्षत्रियों का जातीय स्वभाव रहा है | आल्हा में कहा गया हैबारह बरिस लौं कूकुर जीवै , तेरह लौं जिए सियार | बरिस अठारह क्षत्रिय जीवे , आगे जीवन कौ धिक्कार || यानी अट्ठारह साल के बाद क्षत्रियों के जीने का कोई अर्थ नहीं और यह सच भी है कि उस काल में क्षत्रिय अपनी युवावस्था में लड़ भिड़कर मर भी जाते थे | अपनी आन , बाण और शान के लिए ये अकारण भी युद्ध किया करते थे | यों तो सभी युद्धों की जड़ में जर , जोरू और जमीन ही रही है और राजपूतों के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वे जमीन की रक्षा के लिए अपनी जान देने में भी तनिक भयभीत नहीं होते थे | मसलन राजस्थान की एक कहावत देखेंराजपूत री जात जमीं | यही नहीं ये इतने स्वाभिमानी होते थे कि इन्हें रे और अरे जैसे शब्द भी अपमानजनक लगते  थेनाहर नै रजपूत नै रैकारे री गाल || हंसकर बात करना भी इनके स्वभाव के प्रतिकूल माना जाता था | हंसकर बात करने वाला ठाकुर अच्छा नहीं माना जाता था , कहावत बनीहँसुआ ठाकुर खंसुआ चोर , इन्हें ससुरवन गहिरे बोर ||  ठाकुर हीन नहीं होना चाहिए यानी वह तेजस्वी होना चाहिए , पुरुषार्थी होना चाहिए , उसकी चमक दूर से ही दिखाई पड़नी चाहिए , इसके विपरीत आचरण करता हुआ ठाकुर निंदनीय है , कहावत देखें – 
                बनिया सखरच ठकुर हीन , बैद पूत व्याधि नहिं चीन्ह |

                पंडित चुप चुप बेसवा मइल , घाघ कहैं पांचो घर गइल || 30  
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