कहावतों में जाति विमर्श (Caste Discourse in Proverbs by Dr. Satya Priya Pandey) Part II

शान से रहना , किसी दबना , अपना काम बड़ी तत्परता से करना इनकी विशेषता रही है और सबसे बड़ी बात यह कि इन्हें प्रजा प्रजावत्सल होना चाहिए | दयालुता इनके स्वभाव का आभूषण मानी गई है , कहावत देखें जिसमें  क्षत्रिय सहित अन्य जातियों पर भी विवेचन किया गया है
                 बाभन नंगा जो भिखमंगा , भँवरी वाला बनिया |
                कायथ नंगा करै खतौनी , बढ़इन में निरगुनिया ||
नंगा राजा न्याव देखै नंगा गाँव निपनिया |
दयाहीन सो छत्री नंगा , नंगा साधु चिकनिया || 31  
शरणागत की रक्षा करना , निः शस्त्र पर हाथ उठाना , ब्राह्मण , स्त्री , गऊ पर प्रहार करना क्षत्रिय की विशेषता मानी जाती थी | आल्हा में भी आया है कि – 
                       गऊ ब्राह्मण की रक्षा करि , रक्षा करे वृद्ध अरु नारि |
हा हा खाते को ना मारेउ , ना भागे के परेउ पिछार ||
पाँव पिछारू को ना धरिऔ , शरणागत की सुनेउ पुकार ||
क्वारी कन्या परनारी , ना बालक पर डरियो हाथ || 
अस्त्र शस्त्र पहिले ना करिऔ , लड़िऔ सदा धर्म के साथ || 32  

अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम , देश के प्रति राग जैसा इन्हें रहा वैसा किसी को नहीं रहा | इसलिए जबजब देश की अस्मिता , इसकी आन पर संकट आया , तब तब इन्होंने अपने जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की | राजस्थान इस दिशा में सबसे अग्रगण्य रहा है इसलिए राजस्थान में इन पर बड़ी ही विशिष्ट कहावतें बनीं हैं मसलन – 
             घर जातां ध्रम पलटतां , त्रिया पडंता ताव |
  तीन दिवस मरण रा , कूँण रंक कुंण राव || 33  
इनकी वीरता के किससे प्रसिद्ध हैं | ये  किसी से झुकते नहीं थे , अपनी जान भले दे देते थे , कहावत देखेंराजपूत जाट मूसल के धनुही , टूट जात , नवें नहिं कभी ||  

कालांतर में राजपूत पद प्रतिष्ठा के लोभ में पड़कर इन्होंने अपनी प्रजा को भी दाँव पर लगा दिया , इन्होंने गद्दारी और बेईमानी का सहारा भी लिया अन्यथा ऐसी कहावतें बनती कि सौ ठग एक राजपूत ||
और भीठाकुर गया ठग रह्या , रह्या मुलक रा चोर |
रजपूती धोरा में रलगी , ऊपर रलगी रेत |
           रजपूती रैई नहीं , पूगी समंदा पार | 34   
यानी अब तो सच्चे क्षत्रिय रहे नहीं , अब राजपूत के नाम पर देश में चोर ही बचे हैं | यही नहीं रजपूती शान मानों धूल में मिल गई , अब तो रेत  ही रेत रह गई है | देश काल के अनुसार व्यक्ति के कार्यों का मूल्यांकन स्वाभाविक है लिहाजा क्षत्रियों के कार्यों का भी आज पुनः मूल्यांकन हो रहा है , इस बात पर चर्चा हो रही है क्या वास्तव में क्षत्रिय जिस वीरता और पराक्रम का ढिंढोरा पीटते हैं , क्या वह सच है ? इसी बहस को अभी हाल ही में आई पद्मावत फिल्म ने और तूल दे दिया और पूरे देश में यह बहस शुरू हो गई कि राजपूतों ने क्या वास्तव में बलिदान दिया है , युद्ध लड़े हैं अथवा उन्होंने मुगलों और अंग्रेजों के समक्ष घुटने ही टेके हैं ? समझौते ही किये हैं | वैसे यह अपने तरह का नया ऐतिहासिक विमर्श भी है , इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने की माँग भी है जिससे संभव है कि आने वाले समय में तमाम महानता के आख्यान छोटी छोटी कहानियां बन जाएँ और ऐतिहासिक चरित्र अपनी पहचान ही खो बैठें और लघुमानव के रूप में उनकी प्रतिष्ठा हो जाए , राजपूत भी इसके अपवाद नहीं हैं
अहीर : अहीर मूलतः पशुपालक जाति रही है | ये खेती किसानी से जुड़ी श्रमजीवी जाति रही है , ये गाय भैंस पालते थे , दूध , दही , घी खाते थे और शरीर से ताकतवर होते थे | ये प्रायः लठैती करते थे और  लाठी के बल पर ही अपना वर्चस्व कायम रखते थे किन्तु समाज इनके बारे में कोई बहुत अच्छी धारणा नहीं रखता था अन्यथा इस तरह की कहावतें इनके बारे बनतीं किजब पेड़ मिलय बबुरे से छहांय , मनई मिलय अहिरे से बतलाय | यानी ये बात करने के योग्य नहीं होते , मजबूरी में भले इनसे बात कर लिया जाए | दरअसल इन्हें विश्वास के योग्य नहीं माना जाता था | ये शरीर की भाषा में ही बात करते थे | समझदारी की बात , अथवा दिमागी कसरत इनके बस का नहीं था | इनकी बुद्धि मोटी होती थी ( वैसे भी जब शारीरिक बल पर जोर रहता है तो मानसिक विकास उतना नहीं होता है , पहलवान इसके उदाहरण होते हैं ) इनके बारे में कहा गया है कि कितना भी पढ़ लिख जाएँ , इन्हें उठना , बैठना , बोलना आदि नहीं सकता है , कहावत देखेंकेतनव अहिर पिंगल पढयं , तबौ तीन गुण हीन | उठबो बैठबो बोलिबो, लिए विधाता छीन || इनसे मित्रता करना ठीक नहीं होता और इनसे तभी मित्रता करनी चाहिए जब किसी और जाति का कोई मिलेअहिर मिताई तब करै , जब सबै मीत मरि जायं || इनके विश्वासघात को लेकर यहाँ तक कहा गया है कि साँप का विश्वास किया जा सकता है किन्तु अहीर का नहीं , एक कन्नौजी कहावत देखें – 
                        अहि अहीर गति एक सी , अहि ते बड़ो अहीर |
                        अहि बाचा मइं बंधि सकइ , बंधि ना सकइ अहीर || 35  
अहीर के साथ गड़रिये और पासी  को भी कुटिल स्वभाव का माना गया है और कहावत बनी हैअहिर गड़रिया पासी , तीनों सत्यानासी || और भीअहिर गड़रिया एकै जात , हगइं दुपहरी सउंचइं रात || यही छत्तीसगढ़ी में इस रूप में आया हैअहिर गहिर भोसर जात , हगिन मझनिया छौचिन रात || यानी ये दोनों संस्कारहीन और अशौच जातियाँ कही गई हैं | इन्हें इस कदर मूर्ख समझा जाता था कि इनके बारे में कहा गया किअहीर से जब गुण निकले , जब बालू से घी || इनके बारे में यह धारणा थी कि क्या अहीर भी कोई आदमी होता है , पुरोहित भी अहीर को यजमान नहीं बनाना चाहता था तभी तो कहावत बनीअहिर का क्या यजमान , और लपसी का क्या पकवान || यानी अहीर भी कोई यजमान है और लपसी भी कोई पकवान है ? अहीरों का लोकनायक लोरिक हुआ जिस पर लोरिकायक लोककाव्य की रचना हुई है | कहा जाता है कि अहीर कितना भी जानकार हो जाय वह लोरिक छोड़कर कुछ और नहीं गाता हैकेतनव अहिरा होय सयाना , लोरिक छोड़ गावहिं आना || और भीकेतनो अहीर पढ़े पुरान , लोरिक छोड़ गावे गान ||  कुल मिलाकर ये मेहनतकश जाति रही है | सामाजिक शिष्टाचार और आचार विचार की तो इन्हें समझ थी और ही इन्हें समझाने की कोशिश ही की गई | इस तरह की जातियों को पढ़ाई लिखाई से दूर ही रखा गया था इसलिए समाज के निचले पायदान पर ये  जातियाँ आती थीं | अहीर की तरह ही अन्य जातियाँ भी रहीं हैं मसलन , गुर्जर , जाट , रंगर , कुर्मी , कोइरी आदि आदि | ये कामगार और मेहनतकश जातियाँ रहीं है | ये अन्न उपजाते थे , दूध दही , घी का व्यापार भी करते थे , पशुपालन करते थे और इनमें परस्पर वैमनष्य और प्रतिस्पर्धा भी रहती थी | ये एक दूसरे के पशु आदि भी चुरा लिया करते थे | बाद में जब शिक्षा का प्रचार प्रसार हुआ , इनमें भी जागृति आई और इन्होंने भी अपने बच्चों को पढ़ाने लिखाने पर जोर दिया परिणामस्वरूप इनके जीवन स्तर में परिवर्तन हुआ वह पहले से बेहतर भी हुआ
इस तरह जाति आधारित कहावतों को देखने से एक बात तो यह स्पष्ट निकल कर आती है कि भारतीय समाज में जातियों का वर्चस्व रहा है | उनमें आपस में प्रतिद्वंद्विता भी रही है किन्तु इन कहावतों में उनका उपहास भी किया गया है मसलन उनके खान पान की तथाकथित शुद्धता और उसकी निरर्थकता को भी रेखांकित किया गया है | अयोग्य होने के बावजूद अपनी जाति की हेकड़ी दिखाने वाले लोगों का उपहास करने में और उन्हें आइना दिखाने में वह समाज कोई कोर कसर नहीं छोड़ता | मसलन अवधी में एक कहावत पंडितों के लिए कही जाती रही है किबाप पादै जाने पूत शंख बजावै || यह कहावत यह संकेत करती है कि पंडिताई और पुरोहिती के व्यवसाय में तथाकथित ब्राह्मण के नाम पर अयोग्य लोग भी जाते थे ऐसे लोगों को यह कहावत टारगेट करती है और उन पर तीखा प्रहार भी करती है | कहावतों का मूल स्वभाव ही है व्यंग्य करना , प्रहार करना | कहावतों का मारा पानी नहीं पाता है | दूसरी बात जो और निकलकर आती है वह यह कि इनमें अपनी अपनी जाति के अनुसार व्यवसाय को चुनने और करने पर बल दिया गया है | इससे जाति और व्यसाव की अनुकूलता बनती है मसलन कहावत देखेंजाट मुहासिल बामन शाह , बनया हाकिम कहर खुदा || यानी जाट लगान नहीं वसूल सकता , ब्राह्मण बनिया का काम नहीं कर सकता और बनिया राजा का काम नहीं कर सकता अगर ये  सब अपनी जाति और स्वभाव के विपरीत कार्य करेंगे तो अनर्थ करेंगे , गड़बड़ी करेंगे | अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों कहा गया होगा ? क्या वह समाज जाति को व्यवसाय से जोड़े रखना चाहता था अथवा वह यह चाहता था कि लोग एक दूसरे के व्यवसाय में हस्तक्षेप करें | यह कहीं कहीं जाति व्यवस्था को अपने तरीके से मजबूती प्रदान करने की कोशिश भी थी | यद्यपि व्यवसाय बदल लेने से जाति नहीं बदलती थी ( यह तो आज तक नहीं बदली ) लेकिन बाद में लोग अन्य अन्य  जातियों के व्यवसायों में गए और उसमें उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन भी किया इसलिए वह मिथ टूटा कि कोई व्यक्ति अपनी जाति के इतर जाति का व्यवसाय नहीं कर सकता | दरअसल कहावतें समाज के सामूहिक यथार्थ का सत्त्व हुआ करती हैं इसलिए अपने समय और समाज के सच को वे अपने भीतर सहेजे रहती हैं , अब बाद में चलकर वह सच बदल जाय या बेमानी लगने लगे तो इससे कहावतों का महत्व कम नहीं हुआ करता है मसलन कई कहावोतों में लगभग निष्कर्ष की तरह जातियों की श्रेष्ठता प्रमाणित की गई है मसलन कहावत देखें – 
                              तीन जात उज्ज्वल कहिए , ब्राह्मण, छत्री, वैस |
तीन जात अघोरी , कायथ, कलाल, कोरी |
तीन जात सत्यानासी , अहीर , गड़ेरिया , पासी || 36 
  
 वैसे देश और काल के अनुसार यथार्थ परिवर्तित होता रहता है किन्तु फिर भी इन कहावतों का एक अपना शाश्वतता बोध भी रहा है और वह काफी हद तक सुदृढ़ भी रहा है मसलन जातियों के वर्ण ( रंग ) पर एक कहावत देखें कि – 
                    खत्री होत साँवरे , कायथ होत सूम |
  मैले होयं गंगाजल , निर्मल होय धूम ||
यानी खत्री साँवला नहीं होता , कायस्थ कंजूस नहीं होता और गंगाजल कभी मैला नहीं होता और धुआँ कभी निर्मल नहीं होता | लेकिन इस अपवाद भी हो सकते हैं | खत्री साँवले नहीं होते रहे होंगे और कायस्थ कंजूस नहीं होता रहा होगा इसलिए इस तरह की कहावत बनी | बाकी दोनों गंगाजल और धुंए के बारे में जो कहा गया है वह आज भी उतना ही शाश्वत है , इसमें कोई संदेह नहीं
इस तरह मैंने यहाँ भारत की कुछ प्रमुख जातियों से सम्बंधित कहावतों की चर्चा की है | यों सभी जातियों पर कहावतें बनायी गई हैं | यह विमर्श समाजशास्त्रीय विमर्श है और ये कहावतें विमर्श की माँग भी करती हैं और इस रूप में इनका महत्व सदैव अक्षुण्ण रहेगा , ये कहावतें अर्थ की अनंत संभावनाओं से युक्त हैं , इसी रूप में इनकी सार्थकता है और शाश्वतता भी

        सन्दर्भ सूची
  1. 1.Trust a snake before a jew , A jew before a Greek , but never trust on a  Armenian .  by  Racial Proverbs 
  2. 2.He that would cheat a jew must be a Jew . Ibid 
  3. 3.Trade has spoil the Jew and the Jews have spoilt trade . Ibid
  4. 4.The pole is deceived by the German , the German by the Italiyan , the Itailiyan by the Spainiyard , the Spainiyard by the Jew , the Jew by the Devil. Ibid
  5. 5.Give a shelter to a Slovak and he will turn you out of your house . Ibid 
  6. 6.Bihar Proverb 
  7. 7.वही
  8. 8.लोकप्रकाश , चतुर्थ प्रकाश/2
  9. 9.वही , 5/7
  10. 10.North Indian notes and Queries , vol -2 ,edt. William Crooke 
  11. 11.रामचरितमानस , बालकाण्ड
  12. 12.सामाजिक कहावतें , ग्राम साहित्य ( तीसरा भाग ) पृष्ठ -144 पं राम नरेश त्रिपाठी 
  13. 13.हिमांचली लोकोक्ति संग्रह , पृष्ठ – 24 , मीना शर्मा 
  14. 14.राजस्थानी लोकसाहित्य विशेषांक , वरदा |
  15. 15.वही ,                      
  16. 16.वही
  17. 17.कनौजी लोकसाहित्य में समाज का प्रतिबिम्ब , पृष्ठ – 344 , डा . सुरेश चन्द्र त्रिपाठी 
  18. 18.वही
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  20. 20.सामाजिक कहावतें , ग्राम साहित्य ( तीसरा भाग
  21. 21.रामचरितमानस , बालकाण्ड
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  23. 23.कलाविलास , क्षेमेन्द्र और उनका समाज , पृष्ठ – 97 , डा . मोतीचंद्र 
  24. 24.सामाजिक कहावतें , ग्राम साहित्य ( तीसरा भाग )  
  25. 25.राजस्थानी कहावतों में राजपूत और बनिये का स्वरुप , वीणा , अगस्त- 1961 पृष्ठ – 465 – 467 , डा. कन्हैयालाल सहल 
  26. 26.वही ,
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  28. 28.वही
  29. 29.कतकी पूनम की , अज्ञेय
  30. 30.सामाजिक कहावतें , ग्राम साहित्य ( तीसरा भाग )  
  31. 31.वही ,
  32. 32.आल्ह खंड 
  33. 33. राजस्थानी कहावतों में राजपूत और बनिये का स्वरुप , वीणा , अगस्त- 1961 पृष्ठ – 465 – 467 , डा. कन्हैयालाल सहल 
  34. 34.राजस्थानी कहावतों में राजपूत और बनिये का स्वरुप , वीणा , अगस्त- 1961 पृष्ठ – 465  
  35. 35.कनौजी लोकसाहित्य में समाज का प्रतिबिम्ब , पृष्ठ – 346 , डा . सुरेश चन्द्र त्रिपाठी 
  36. 36.North Indian notes and Queries , vol -2 ,edt. William Crooke 

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